कांग्रेस की सत्ता में विफलता: मध्य प्रदेश के संदर्भ में विवेचना
मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने पिछली बार अपनी सरकार बनाई थी, लेकिन फिर भी उनकी सरकार 5 साल क्यों नहीं चली? इसके पीछे एक बड़ा कारण खुद एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ थे।
कमलनाथ की नेतृत्व विफलता
कमलनाथ का मानना था कि वे मध्य प्रदेश के सबसे बड़े नेता हैं। इस वजह से उन्होंने अन्य नेताओं को नकारा और अपनी भूलों को दोहराया। वे अन्य दलों और नेताओं की आवश्यकता और महत्वता को समझने में विफल रहे।

सिंधिया की नाराजगी
पिछली बार, कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को नकारा, जिससे सिंधिया ने सरकार को गिरा दिया। यह घटना ने दिखाया कि कमलनाथ की नेतृत्व शैली में कितनी कमजोरियां थीं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति और मध्य प्रदेश का संबंध
कमलनाथ की गलतियों ने न सिर्फ मध्य प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति को प्रभावित किया, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी इसका असर पड़ा। वे अखिलेश यादव के साथ गठबंधन नहीं कर पाए, जिससे कांग्रेस की स्थिति और भी कमजोर हो गई।
विधानसभा सीटों पर विवाद
अगर एमपी में बात करें तो यहां पर कुल ऐसी 15 सीटें हैं जहां सपा और बसपा का बड़ा वोट बैंक है, यह सीटें कौन सी आपको यह भी बताते हैं, सवलगढ़ सीट जहां से कांग्रेस चुनाव तो जीत गई, लेकिन बीएसपी यहां दूसरे नंबर पर रही, जौरा सीट यहां बीएसपी दूसरे नंबर पर रही, भिंड वह सीट है जहां से बीएसपी ने भाजपा को हराया था, ग्वालियर ग्रामीण सीट यहां पर बीएसपी दूसरे नंबर पर रही, पुहारी विधानसभा सीट पर बीएसपी दूसरे नंबर की पार्टी रही, बीजावर में सपा ने चुनाव जीता था, पथरिया में बीएसपी ने चुनाव जीता था, रामपुर बघेलान में बीएसपी दूसरे नंबर पर थी, देवतालाब सीट पर बीएसपी. 2 नंबर पर थी, पृथ्वीपुर, निवाड़ी, गोड़, पारसवारा और बालाघाट, ये वो सीटें हैं जहां सपा दूसरे नंबर पर रही, यानी 15 सीटों पर यूपी वाली पार्टियों का दमखम है, इनमें से छह सीटों पर सपा का भी दबदबा है, ऐसे में कांग्रेस को चाहिए था कि वह बीएसपी, सपा को अपने साथ ले

निष्कर्ष
कमलनाथ की नेतृत्व में कांग्रेस की विफलता ने यह साबित किया कि राजनीतिक समझ और सहयोग की आवश्यकता है। इसके बिना कोई भी दल सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
