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Reading: मैं अछूत आंबेडकर को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा
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Tathagat LIVE > प्रत्यक्षदर्शी लिखते हैं > भदंत आनंद कौसल्यायन > मैं अछूत आंबेडकर को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा
भदंत आनंद कौसल्यायनडॉ आंबेडकरNews

मैं अछूत आंबेडकर को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा

IronMan
Last updated: 2023/11/04 at 8:42 PM
IronMan 10 Min Read
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सतारा से मुंबई जाना हुआ – Went from satara to mumbai

जब रामजी सूबेदार की स्टोरकीपर की नौकरी छूट गई तब वह परिवार सहित सतारा से मुंबई चले आए । यही सोचकर कि मुंबई में बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से हो सकेगी आनंदराव और भीम दोनों का एलीफेंट स्कूल में नाम लिखाया गया । 

Contents
सतारा से मुंबई जाना हुआ – Went from satara to mumbaiहमारी रोटियां ‘छू’ जाएगी  – Our breads will be ‘touched’अरे तू महार है  – hey you are ‘mahar’मैं अछूत लड़कों को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा – I will not teach Sanskrit to untouchable boysपैसों की थैली भी चुराई थी – the money bag was also stolenअछूत विद्यार्थी  – untouchable studentआंबेडकर के मन में भगवान बुद्ध के प्रति श्रद्धा और भक्ति के बीच बोए – Ambedkar sowed reverence and devotion towards Lord Buddha in his mind.अछूत’ विद्यार्थी को आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार हूं – Ready to provide financial assistance to untouchable studentsकॉलेज की कैंटीन का मालिक ब्राह्मण था – The owner of the college canteen was a Brahmin.विद्वान की भी जात पूछी जाती है भारत में – Even a scholar is asked about his Jat status in India.

हमारी रोटियां ‘छू’ जाएगी  – Our breads will be ‘touched’

स्कूली किताबों का पढ़ना तो भीम को एकदम अच्छा ना लगता था । किंतु बाहर की किताबों को वह बहुत पढ़ना चाहता था । स्कूली किताबों को तो वह स्कूल आते जाते समय एक आंख देख भर लेता बुद्धिमान होने से उतने भर से ही स्कूल में उसकी ‘पोजीशन’ बनी थी । धीरे-धीरे बाहरी पुस्तक पढ़ने का शौक उनका संग्रह भी करने के शोक में बदल गया । यह शौक बेचारे रामजी सूबेदार को बहुत महंगा पड़ने लगा किंतु वह जैसे भी बनता किताबें संबंधी भीम की हर नई से नई मांग को पूरा करने की कोशिश करते । पुस्तकों का संग्रह करने का यह शौक उम्र भर डॉ भीमराव अंबेडकर का साथ ही रहा । बहुत ही कम लोग लोगों के पास अपनी पुस्तकों का इतना बड़ा संग्रह रहा होगा जितना बड़ा संग्रह बड़े होने पर बाबासाहेब ने एकत्र कर लिया था । उन्होंने अपना ‘राजगृह’ मकान केवल अपने रहने के लिए नहीं बनवाया था । बल्कि अपनी पुस्तकों को ही रखने के लिए, एलीफेंट हाई स्कूल सरकारी हाई स्कूल था तो क्या हुआ । अध्यापक और विद्यार्थी तो वहां के भी दकियानूसी ही थे । एक दिन गणित के अध्यापक ने भीम  से कहा कि जाओ तुम बोर्ड पर सवाल को हल करो । जो ही भीम बोर्ड की ओर बढ़ा लड़के चिल्लाये हमारी रोटियां के डिब्बे बोर्ड के पीछे रखे हैं वह छु जाएंगे तब लड़कों ने अपने-अपने डिब्बे उठा लिए तभी भीम बोर्ड के पास जा सका । 

अरे तू महार है  – hey you are ‘mahar’

अध्यापक ने लड़कों को कुछ नहीं कहा । उसका काम उन्हें ‘गणित’ पढ़ना था । कुछ शिष्टाचार सीखना नहीं और ‘छुआ -छूत’ करने को तो वह भी धर्म ही मानता रहा होगा । क्योंकि आखिर वह भी हिंदू ही था । एक बार एक ब्राह्मण अध्यापक ने भीम को यह कह दिया था । अरे तू महार है आखिर पढ़ लिखकर क्या करेगा । भीम ने मुंह तोड़ उत्तर दिया मैं पढ़ लिखकर क्या करूंगा सर यह पूछना आपका काम नहीं । आदि दोबारा इस प्रकार मेरी जाति का उल्लेख कर मेरा अपमान किया तो इसका परिणाम अच्छा ना होगा । 

मैं अछूत लड़कों को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा – I will not teach Sanskrit to untouchable boys

ऐसा उत्तर कोई भीम ही दे सकता था । रामजी सूबेदार की यह बड़ी इच्छा थी कि भीम संस्कृत भाषा का बड़ा पंडित बने आनंदराव और भीम दोनों जने संस्कृत पढ़ना चाहते थे। किंतु वह असमर्थ थे संस्कृत पढ़ाने वाले ब्राह्मण पंडित ने साफ-साफ कह दिया था । ‘मैं अछूत लड़कों को संस्कृत नहीं पढ़ाऊंगा’ ब्राह्मणों को विद्या प्रेमी समझा जाता है । किंतु दूसरों को अपनी भाषाएं सीखने ना देकर ऐसे ब्राह्मणों ने संस्कृत की जितनी बड़ी  कुसेवा की है । इतनी और किसी दूसरे ने नहीं की । 

पैसों की थैली भी चुराई थी – the money bag was also stolen

भीम की इच्छा थी कि अपने पिता रामजी सूबेदार पर कभी भार न बनकर वह अपने पैरों पर ही खड़ा हो सके । सतारा में रहते समय एक बार उसने स्टेशन पर जाकर कुली का काम भी किया था । इतना ही नहीं एक बार मुंबई पहुंचकर मिल मजदूर बनने के ख्याल से अपनी बुआ मीराबाई के पैसों की थैली भी चुराई थी किंतु हाय रे भाग्य उसे थैली में सिर्फ एक आध आना ही था । 

अछूत विद्यार्थी  – untouchable student

यह हम बता ही चुके हैं कि यद्दापि भीम स्कूली पुस्तकों की पढ़ाई को बहुत महत्व नहीं देता था । किंतु वह बाहरी पुस्तक बहुत पड़ता था । ज्ञान कुछ स्कूली पुस्तकों में ही कैद नहीं रहता । हाई स्कूल से छुट्टी मिलते ही भीम पास के एक बगीचे में एक निश्चित स्थान पर जा बैठता और अपनी पुस्तकों में डूब जाता । माननीय कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर नाम के एक सहृदय वाले अध्यापक का ध्यान भीम की और आकर्षित हुआ । उन्होंने भीम से पूछकर उसका सारा परिचय मालूम कर लिया । जब उन्हें मालूम हुआ की भीम एक ‘अछूत विद्यार्थी है’ तो वह इतने चकित हुए उतने ही प्रसन्न भी वह भीम को पढ़ने के लिए अच्छी पुस्तक देने लगे । 

आंबेडकर के मन में भगवान बुद्ध के प्रति श्रद्धा और भक्ति के बीच बोए – Ambedkar sowed reverence and devotion towards Lord Buddha in his mind.

अब भीम इतने बड़े हो चले थे कि उन्हें केवल भीम ना कहकर भीमराव कहना योग्य होगा सन 1907 में भीमराव ने मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की उन्हे 750 में से कुल 282 नंबर मिले थे । जिसका मतलब था कि वह तीसरे दर्जे में ही उत्तीर्ण हुए । उस समय किसी अछूत विद्यार्थी के लिए यह भी कम बड़ी बात नहीं थी । उसने मैट्रिक पास कर ली थी । एक सभा की गई जिसमें भीमराव को फूल मालाएँ पहनाकर उसका स्वागत किया गया । उस सभा में माननीय कृष्णाजी केलुस्कर ने कहा कि मैं भीमराव को जानता हूं वह एक बुद्धिमानी, तेजस्वी, और होनहार लड़का है । भीमराव को कॉलेज में दाखिल होकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए । उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक भीमराव को भेंट की जिसका नाम था (बुद्ध चरित्र) । हो सकता है इसी पुस्तक ने सर्वप्रथम डॉ भीमराव अंबेडकर के मन में भगवान बुद्ध के प्रति श्रद्धा और भक्ति के बीच बोए हो । 

अछूत’ विद्यार्थी को आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार हूं – Ready to provide financial assistance to untouchable students

जब भीमराव एलफिंटन कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास हुए तो रामजी सूबेदार को जितनी खुशी हुई उतनी ही चिंता भी उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह भीमराव को किसी भी तरह बी.ए में पढ़ सके । माननीय केलुस्कर इस समय बड़े सहायक सिद्ध हुए । कभी विद्या प्रेमी महाराज सायाजीराव गायकवाड़ मुंबई पधारे थे । उन्होंने किसी सभा में घोषणा की थी कि मैं किसी भी बुद्धिमान ‘अछूत’ विद्यार्थी को आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार हूं । माननीय कुलेस्कर भीमराव को लेकर महाराज की सेवा में उपस्थित हुए और उन्हें उनके वचन की याद दिला रुपए 25 महीने की सहायता दिलवाई । 

कॉलेज की कैंटीन का मालिक ब्राह्मण था – The owner of the college canteen was a Brahmin.

1912 में भीमराव बी.ए की परीक्षा में भी तीसरी श्रेणी में ही उत्तीर्ण हुए । इसका का कारण यही रहा होगा कि वह कॉलेज की पढ़ाई करते समय बाहरी पुस्तक ही अधिक पढ़ते रहे होंगे। 

कॉलेज में पढ़ते समय भी भीमराव का ‘अछुतपन’ उनके पीछे लगा रहा । कॉलेज की कैंटीन का मालिक ब्राह्मण था । वह भीमराव को चाय पानी तक नहीं देता था । डॉ अंबेडकर का कहना रहा स्कूल में मुझे पीने के लिए पानी भी नसीब नहीं होता था । मैंने बिना पानी के कई दिन बिताए मुंबई के एलीफैंटन कॉलेज में भी यही विवस्था थी । 

विद्वान की भी जात पूछी जाती है भारत में – Even a scholar is asked about his Jat status in India.

कहावत है कि “राजा का तो आधार अपने ही देश में होता है किंतु विद्वान की पूजा सर्वत्र होती है” इसके साथ इतना और जोड़ देना चाहिए कि भारत में विद्वान की पूजा तभी होती है जब वह विद्वान तो हो लेकिन उसके साथ ही अछूत या शूद्र ना हो भारत की जनसंख्या अधिकांश ‘अछूत’ और ‘शूद्र’ ही है । 

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1 Comment 1 Comment
  • Luckey singh says:
    November 5, 2023 at 11:57 am

    Sir aap ya ai Wala photo kha sa banata ho
    Huma bhe sikha digea

    Reply

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