सोचिए, दिल्ली में कैसी नौटंकी हुई। मैडम, एक्ट्रेस कंगना रनौत, मंच पर आई थीं। इन्हें तीर चलाकर रावण को मारना था, पर इन्हें तीर चलाना नहीं आया। मुझे हैरानी होती है कि ऐसे लोग कहां से आते हैं। कैसा रहा होगा इनका बचपन? यह वही लोग हैं जो इस देश के 10% हैं जिन्हें तीर चलाना नहीं आता, जिन्हें बाजरा कैसे उगता है या गन्ने की कटाई कैसे होती है, उसका अंदाजा भी नहीं है। इन्हें तो ये भी पता नहीं कि गाय का पहला दूध कौन सा होता है, फिर भी ये गाय के नाम पर राजनीति करते हैं। घर में तो कुत्ते पालते हैं, लेकिन जातिवाद पर आधारित नफरत भरा दृष्टिकोण रखते हैं।
कंगना रनौत को तीर चलाने नहीं आ रहा, और लोग कह रहे हैं कि अगर यह फिल्म होती, तो वह हिमालय को भी ढहा देती। इन फिल्मी लोगों को वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। दक्षिण भारत के अभिनेताओं की फिल्में देखिए, वे वास्तविक जीवन को प्रस्तुत करते हैं। फिल्में जैसे ‘मसान’ और ‘सैराट’ देखिए, और जानिए कि वास्तविकता कैसे दिखाई जाती है।
कंगना रनौत नरेंद्र मोदी को अवतार मानती है। इस देश के बहुजनों को इन लोगों का बहिष्कार करना चाहिए। इनकी फिल्में नहीं देखनी चाहिए, क्योंकि ये आपके आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के विरोधी हैं।
क्या किसी टीवी या अखबार ने आपको नागपुर दिखाया? आप अमेरिका की फिल्में देखें, वहां सभी जातियों का प्रतिनिधित्व है।
आपकी आइकॉन को तीर चलाना नहीं आता, और जब तीर चलाना था तो प्रैक्टिस करके आती। एक गोल्ड मेडल विजेता, दीपिका को बुला लेते। इसलिए मैं कहता हूं, अपनी बात कहने का समय आ गया है। धन्यवाद।
