📖 पूनापैक्ट लेखक – बी.आर. सांपला लिखते है[tta_listen_btn]
गांधी और अम्बेडकर के बीच मतभेद अवश्य थे, लेकिन गांधी किस प्रकार से दलित विरोधी थे, इस विषय पर बी.आर. सांपला विवेचना करते हैं।

15 सितंबर 1931 को गांधी ने संघ योजना समिति (फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी) में अपने भाषण में कांग्रेस को देश की सबसे अधिक शक्तिशाली तथा प्रतिनिधिक संस्था साबित करते हुए दावा किया कि कांग्रेस सभी भारतीय हितों में एवं वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है उन्होंने कहा कि कांग्रेस न केवल मुसलमान, सिखों, और पारसियों का प्रतिनिधित्व करती है । बल्कि अछूतों का भी नेतृत्व वह करती है. क्योंकि छुआछूत मिटाने की योजना कांग्रेस के राजनीतिक मंच पर लाई जा चुकी है। कांग्रेस सभी भारतीय पुरुषों का ही नहीं वरन समस्त नारियों का प्रतिनिधित्व करती है। क्योंकि वह गांधी स्वयं कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधि हैं इसलिए यह समझना चाहिए कि वह संपूर्ण भारतीय राष्ट्र के प्रमुख प्रतिनिधि हैं।
पाठकों की जानकारी के लिए लिखना उचित रहेगा कि गांधीजी के भाषण में कितना सत्यांश था। कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई जिसमें महादेव, गोविंद, रानाडे जी ने समाज सुधार की आवश्यकता की ओर कांग्रेस का ध्यान आकर्षित किया था। 1886 में कांग्रेस द्वारा दूसरा अधिवेशन कोलकाता में हुआ जिसमें लंबे वाद-विवाद के बाद समाज सुधार के प्रश्न पर विचार करने के लिए कांग्रेस से अलग अखिल भारतीय समाज सुधार सम्मेलन नामक संस्था की स्थापना की गई। 1887 में मद्रास में कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन के अवसर पर राजा सर टी माधवराव की अध्यक्षता में अखिल भारतीय समाज सुधार सम्मेलन का पहला अधिवेशन हुआ। 1894 तक कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही साथ कांग्रेस के ही पंडाल में समाज सुधार सम्मेलन का अधिवेशन भी होता रहा। कांग्रेस में इन दो दलों के सिवा एक तीसरा दल कट्टरपंथियों का था। जो समाज सुधार का ही विरोधी था। इन कट्टरपंथियों का नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे। 1895 पुणे में सुरेंद्र नाथ बनेर्जी की अध्यक्षता में कांग्रेस का 11वां अधिवेशन होने जा रहा था। पुणे में कट्टर ब्राह्मण वर्ग और सनातनी हिंदुओं का जोर था। जिनका नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे सनातनी हिंदुओं का जोर देखकर जस्टिस रानाडे गोखले आदि नेताओं ने यह मान लिया कि समाज सुधार सम्मेलन कांग्रेस के पंडाल में नहीं करेंगे। सुधारकों ने अपना स्वतंत्र पंडाल बनाकर सम्मेलन करना चाहा तो सनातनियों ने कहा कि हम पुणे में समाज सुधार नहीं होने देंगे और यदि सम्मेलन हुआ तो हम पंडाल में आग लगा देंगे। आखिर पुलिस के संरक्षण में दूसरे पंडाल में समाज सुधार सम्मेलन का अंतिम अधिवेशन हुआ और इसके बाद समाज सुधार के प्रश्न पर कांग्रेस मौन हो गई। अस्पृश्यता निवारण का प्रश्न कांग्रेस के विचार क्षेत्र की सीमा से बाहर का प्रश्न हो गया लोकमान्य तिलक ने सन 1918 में सोलापुर में भाषण देते हुए कहा था। “वह (लोकमान्य तिलक) यह नहीं समझ सके कि तेली पान बीड़ी बेचने वाले और धोबी लोग आदि विधानसभाओं में किस लिए जाना चाहते हैं ।उन्हें अपने काम से सरोकार रखना चाहिए उनका कर्तव्य तो केवल आदेश मानना ही है ना कि कानून बनाने के लिए सत्ता की इच्छा करना”।
1922 में कांग्रेस ने एक बार फिर बारदोली कार्यक्रम में अछूतोध्दार के कार्य को स्थान दिया उसके लिए चार सदस्यों की एक कमेटी नियुक्त की गई थी। जिसके स्वामी श्रद्धानंद संयोगजक थे। स्वामी श्रद्धानंद अछूतोध्दार कार्य के विशेषज्ञ तथा निष्ठावान कार्यकर्ता थे। वह अखिल भारतीय स्तर पर अछूतोध्दार के प्रश्न को उठाना चाहते थे। परंतु कांग्रेस की अछूतोंदर के प्रति ढीली तथा अपेक्षापूर्ण नीति के कारण उन्होंने कुछ किए बिना ही उस कमेटी से त्यागपत्र दे दिया। स्वामी श्रद्धानंद का त्यागपत्र कांग्रेस की अछूतोध्दार के कार्य में पूरी दिलचस्पी ना होने का सबूत है।
1924 में केरल में बेकुम नामक स्थान पर अछूतों ने सत्याग्रह किया कि ट्रावनकोर में उन्हें भी उस सड़क पर चलने की अनुमति दी जाए। जिस पर केवल ऊंची जातियों के लोग चलते हैं। सत्याग्रहियों के साथ सहानुभूति के तौर पर वहां बसे सिखों ने गुरु का लंगर लगा लिया। गांधीजी ने उन सिखों की ऐसा करने के लिए निंदा की क्योंकि इससे अछूतों को बल मिलता है। डॉ अंबेडकर ने 2 मार्च 1930 को नासिक के कलाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश अधिकार के लिए सत्याग्रह शुरू किया था। उस समय भी सिखों ने अछूतों की बड़ी सहायता की थी। कुछ सिख गांधीजी के पास भी गए ताकि वह सत्याग्रह का समर्थन करें किंतु उल्टे गांधीजी ने कहा “सत्याग्रह विदेशियों के विरुद्ध किया जाना चाहिए अपने ही देश के लोगों के विरुद्ध सत्याग्रह करना उचित नहीं। एक संदर्भ में गांधीजी ने यह भी सुझाव दिया था। कि यदि स्वर्ण हिंदू अछूतों को पुराने मंदिरों में नहीं जाने देते तो उनके लिए नए मंदिर बनवा देने चाहिए”।
डॉ अंबेडकर ने भाप लिया कि गांधीजी किस प्रकार झूठ बोल रहे हैं और दुनिया भर के लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयत्न कर रहे हैं। डॉ अंबेडकर ने 15 सितंबर 1931 को फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी में बोलते हुए कहा कि कमेटी रियासतों को, जो कुछ वे मांगती है, नहीं दे सकती डॉ अंबेडकर की बात सुनकर महाराजा बीकानेर भड़क उठे और कहने लगे की रियासतें भी कोरा चेक देने को तैयार नहीं है। वह मांग कर रहे थे रियासतों को अपने प्रतिनिधि मनोनीत करने का अधिकार राजाओं के पास ही होना चाहिए। डॉ अंबेडकर ने रियासती जनता जनता को रजवाड़ों और बिश्वेदारों, के पंजे में जकड़ी हुई, कराह रही जनता को मुक्ति दिलाने के लिए 15 सितंबर 1931 को फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी में कहा, इससे पहले की रियासत को फेडरेशन में शामिल होने की स्वतंत्रता दी जाए उसे स्पष्ट करना पड़ेगा कि उनके पास अपने नागरिकों को सभ्य जीवन प्रदान करने योग्य आवश्यक साधन और समर्थ है। संविधान सभा के लिए रियासतों के प्रतिनिधि लोगों द्वारा निर्वाचित हो, वे मनोनीत नहीं किए जाने चाहिए मानोनयन का सिद्धांत उत्तरदाई सरकार के सिद्धांत के विरुद्ध है। जहां तक बिश्वेदारों को विशेष अधिकार देने का संबंध। है उन्हें विशेष अधिकार नहीं दिए जाना चाहिए क्योंकि वह हमेशा रूढ़िवादियों का पक्ष लेते हैं इसलिए वह स्वतंत्रता और प्रगति के मार्ग में बाधक हैं।
गांधी जी ने हिंदू मुस्लिम अर्थात कांग्रेस लीग समझौते के लिए काफी कोशिश की वह हाथ में कुरान लेकर मुस्लिम नेता सर आगा खां से मिलने गए। गांधीजी मुसलमान की सभी मांगों को मानने को तैयार थे इसके बदले में केवल यही चाहते थे कि मुसलमान अछूतों का पृथक अस्तित्व स्वीकार न करें, इसी प्रसंग में मुसलमान के प्रसिद्ध नेता आगा खां अपने जीवन चरित्र में लिखते हैं गोलमेज कांफ्रेंस में शामिल होने वाले प्रसिद्ध भारतीय नेताओं को मैंने रिजिट होटल में जहां में स्वयं भी ठहरा हुआ था। खाने का आमंत्रण दिया वार्तालाप के दौरान मैंने गांधीजी से कहा कि आप तो भारतीय हिंदू मुसलमान सबके बापू हैं। अतः बापू होने के नाते आपको मुसलमान की शर्तें मान लेनी चाहिए गांधीजी ने मेरे इस वाक्य का फौरन खंडन करते हुए कहा -यह बात गलत है कि मैं मुसलमान के लिए पित्त भावना रखता हूं खालिस राजनीतिक दृष्टिकोण का ध्यान रखते हुए मैं मुसलमानो के साथ समझौता करने के लिए बिल्कुल तैयार हूं। किंतु ऐसा समझौता करने में मेरी दो शर्ते हैं पहले यह कि मुसलमान भारत की स्वतंत्रता के लिए जारी संघर्ष में निष्ठावान होने का पूरा-पूरा सबूत दें और दूसरी शर्त यह है कि वह अछूतों को पृथक राजनीतिक अधिकार दिलाने की हिमायत ना करें। गांधीजी की यह बात सुनकर जिन्ना साहब जो अभी तक मौन धारण किए बैठे थे उत्तेजित होकर बोले कि स्वतंत्र भारत की आजादी की जंग लड़ने की कांग्रेस की इजारादरी नहीं है। मुसलमान कभी भी ऐसी निर्लज शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकते दूसरी बात यह कि मुसलमान जिन अधिकारों के प्राप्ति के लिए यहां लड़ रहे हैं। ऐसे अधिकारों की प्राप्ति के लिए अल्पसंख्यक रखने वाले किसी भी वर्ग या जमात की जायज हिमायत करने के पक्ष को वह कभी नहीं छोड़ सकते।
गांधीजी ने डॉ अंबेडकर को नीचा दिखाने के लिए मुसलमान को कोरा चेक पेश किया। गांधीजी मुसलमानो के नेता कायदेआजम मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बलगीर हुए। यहां तक की गांधीजी ने अपने हाथों से जिन्ना साहब को शराब भी पिलाई ।(संदर्भ- जे.एन. साहनी लिखित पुस्तक ‘दी लिड ऑफ’ ) मिस्टर जिन्ना से गांधीजी ने कहा मैं तुम्हारी सब शर्तें मानने को तैयार हूं यदि तुम मेरे मेरे साथ मिलकर अछूतों की मांगों का विरोध करो, परंतु मिस्टर जिन्ना ने इस बात को स्वीकार नहीं किया और कहा हम स्वयं अल्पसंख्यक होने के कारण जब विशेष अधिकार चाहते हैं तो फिर दूसरे अल्पसंख्यकों की मांग का विरोध कैसे कर सकते हैं।
गांधी और अम्बेडकर के बीच मतभेद, कमेंट करके आप ही बताएं दलितों का सच्चा हितैषी कौन था

Mr. Gandhi was a political leader only. His whole focus was on his political reputation and protecting the Varna system. He was totally biased man as he had two types of news paper once was in English, in which he was showing that he was supporter of dalit community and other was in regional language in which he was supporting Varna system openly. Where we knew Dr. Ambedkar was working for dalit as well for women of every community. And HE was doing everything openly without hiding anything, that’s the difference between Mr. Gandhi and Dr. B.R Ambedkar.