
बाबासाहब डॉ भीमराव आंबेडकर ने स्वयं के स्वास्थ्य की चिंता ना करते हुए भारतीय संविधान का निर्माण करने के लिए उसमें अपनी जान डाल दी । उनका संविधान सभा का अंतिम भाषण अर्थात राष्ट्रीयता की असली मार्गदर्शिका है । संविधान के संबंध में बाबासाहब डॉ आंबेडकर का भाषण सुनकर संविधान समिति के सदस्य उल्लासित हुए । उनके मधुर स्पष्ट और वजनदार भाषण के बारे में और अनन्यसाधारण विश्लेषण पद्धति के बारे में सदस्यों ने उन्हें धन्यवाद किया । प्रा.के.टी शाह, पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र और संविधान मसौदा समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णम्माचारी ने उनका मनपूर्वक अभिनंदन किया । डॉ पंजाबराव देशमुख ने आनंद व्यक्त किया। काजी सैय्यद कमरुद्दीन ने बधाई देते हुए कहा कि बाबासाहब डॉ आंबेडकर को भावी पीड़ियाँ संविधान के शिल्पकार के तौर पर पहचानेंगि ।
अध्यक्ष माननीय डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा

संविधान समिति ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत किया उनके समापन भाषण में संविधान सभा के अध्यक्ष माननीय डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा, “प्रधान के रूप में में प्रतिदिन कुर्सी पर बैठ मैं किसी भी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा अच्छे ढंग से यह बात नोट की है कि प्रारूप समिति और इसके सभापति डॉ आंबेडकर ने, अस्वस्थ होते हुए भी, बहुत उल्लास और लगन से काम किया है । हमने डॉ आंबेडकर को प्रारूप समिति में लेने और इसका सभापति बनने का जो निर्णय लिया था हम उससे बेहतर और ज्यादा सही निर्णय ले ही नहीं सकते थे। इन्होंने न केवल अपने चुने जाने को सार्थक बनाया अपितु जो काम इन्होंने किया है उसे चार चांद लगा दिया है”
माननीय सरदार वल्लभभाई पटेल

माननीय सरदार वल्लभभाई पटेल- एक कांग्रेसी ने सरदार वल्लभभाई पटेल से सवाल किया डॉ अंबेडकर को संविधान सभा में मसौदा-समिति का अध्यक्ष क्यों चुना? वे तो गांधीजी के कटु आलोचक और कांग्रेस पार्टी के विरोधी थे । इस पर सरदार पटेल का उत्तर बड़ा विचित्र था । “तुम विधान बनाने के बारे में क्या जानते हो? हमने इस कार्य के लिए सर्वोत्तम व्यक्ति का चुनाव किया है”। जीस लोहपुरुष ने बाबासाहब डॉ आंबेडकर के लिए संविधान सभा के दरवाजे तो क्या खिड़कियां तथा रोशनदान तक बंद कर दिए थे उन्हें भी बाबासाहब डॉ आंबेडकर की विद्धता का लोहा मानना पड़ा ।
माननीय टी.टी कृष्णमाचारी

टी.टी कृष्णमाचारी ने संविधान समिति में 5 नवंबर 1948 को जो भाषण किया उसमें उन्होंने कहा सदन को शायद यह मालूम हुआ होगा कि, आपके चुने हुए सात सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया उसकी जगह रिक्त ही रही एक सदस्य की मृत्यु हुई उसकी जगह भी रिक्ति ही रही एक सदस्य अमेरिका गए उनकी जगह भी वैसी ही खाली रही चौथा सदस्य रियासतदरों संबंधी कामकाज में व्यस्त रहे इसलिए वह सदस्य होकर भी ना के बराबर ही थे। दो-एक सदस्य दिल्ली से दूरी पर थे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने से वे भी उपस्थित नहीं रह सके आखिर यह हुआ कि संविधान बनाने का सारा बोझ अकेले डॉ आंबेडकर पर ही आन पड़ा इस स्थिति में उन्होंने जिस पद्धति से वह काम पूरा किया उसके लिए वह निसंदेह आदर के पात्र है मैं निश्चय के साथ आपको यह बताना चाहता हूं कि डॉ आंबेडकर ने इस प्रकार की अनेक कठिनाइयों से भी मार्ग निकालकर यह कार्य पूर्ण किया जिसके लिए हम उनके हमेशा ऋणी रहेंगे।
माननीय अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर

संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य माननीय अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने प्रारूप संविधान को न्यायसंगत बतलाते हुए डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के कार्य की प्रशंसा की और कहा “मैं प्रारूप समिति की गतिविधियों में, स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय भाग नहीं ले सका… इसलिए प्रारूप के लिए जो सुझाव आए संशोधन हुए उनके लिए मैं स्वयं किसी तरह की प्रशंसा का दवा नहीं करता हूं… ।
माननीय सैयद मोहम्मद सादुल्ला

प्रारूप समिति के अनेक सदस्य माननीय सैयद मोहम्मद सादुल्ला (आसाम) ने कहा कि प्रारूप समिति को अगस्त 1947 के एक प्रस्ताव द्वारा गठित किया गया था। मैं प्रारंभिक सत्र में स्वास्थ्य कर्म से उपस्थित नहीं रह सका किंतु समिति की कार्रवाइयों और संविधान सभा की बैठकों से स्पष्ट है कि हमारे प्रारूप संविधान का मसौदा अपनी सीमा से आगे नहीं है ।
संविधान सभा के सामने प्रारूप समिति के सदस्य माननीय टी.टी कृष्णमाचारी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर एवं सैयद मोहम्मद सादुल्ला द्वारा खड़ा किया गया यह चित्र पूर्ण सिद्ध करता है कि संविधान के प्रमुख निर्माता बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ही थे ।
बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के आलोचक रहे माननीय पंडित हरगोविंद पंत ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि अध्यक्ष महोदय में पंडित अंबेडकर महोदय के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए या उपस्थित हुआ हूं। मैं ‘पंडित’ शब्द का प्रयोग जान-बूझकर कर रहा हूं क्योंकि डॉ आंबेडकर द्वारा इस संविधान की पांडुलिपि की रचना उसका प्रतिपादन तथा युक्तियुक्त समर्थन जिस पंडितीय के साथ किया गया है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है और उन्हें इस पद का अधिकारी सिद्ध करता है। इतना ही नहीं उनके पंडितीय से प्रभावित होकर हमारे कतिपय सदस्यों ने उन्हें मनु महाराज की पदवी देने तक की कृपा की है। मैं समझता हूं कि उन्हें यदि ‘मनु’ नहीं तो ‘उप-मनु’ की उपाधि तो दी ही जा सकती है ।
यह महाप्राण जोगिंदरनाथ मंडल के शुभ कार्यों, उनके सार्वजनिक कल्याणकारी कार्यों तथा व्यक्तित्व का ही प्रभावी फल था कि उनके बहुमूल्य प्रयासों से बाबासाहेब डॉ अंबेडकर बंगाल प्रांत से संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य से चुने गए और अपनी मेघा की चमक से सभी सदस्यों को चकाचोंध कर दिया अन्तः इसका संपूर्ण श्रेय महाराणा जोगेंद्रनाथ मंडल को जाता है। जिनके द्वारा बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर को उचित स्थान मिल सका और मसौदा समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। इस प्रयास के द्वारा ही यह संभव हो सका था कि बाबासाहेब डॉ आंबेडकर अछूत वर्ग के विशेष हितों तथा सामान्य भारतीय नागरिकों के मूल मानवीय अधिकारों के लिए संविधान में प्रावधान कर सकें ।
इसी प्रकार बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के संविधान सभा में एक और विरोधी रहे मुस्लिम नेता माननीय ताजामूल हुसैन ने भी बाद में बाबासाहेब डॉ आंबेडकर की प्रशंसा करते हुए कहा वे प्रतिभाशाली है संसार के कानूनों और संविधानों के विषय में हर बात जानते हैं । जो बात उन्हें ज्ञात नहीं वह जानने के योग ही नहीं है । उन्होंने सेहत के खराब होने के बावजूद शुरू से ही बहुत परिश्रम किया है। उनकी इस अथक मेहनत के परिणाम स्वरुप यह उल्लेखनीय संविधान रचा जा सका है
माननीय डॉ पायली- माननीय डॉ पायली ने बाबासाहेब डॉ आंबेडकर की प्रशंसा करते हुए लिखा आंबेडकर में बहुत से गुणों के चक्रव्यूह, विद्वता, पंडितीय, कल्पना शक्ति, तर्क,वाकपटुता, और अनुभव था। संसद में जब कभी वे संविधान के प्रारूप के प्रावधानों की आलोचनाओं का उत्तर देने के लिए बोलते थे, संविधान के प्रावधानों का स्पष्ट और सुंदर रूप सामने आ जाता था। उनके बैठते ही शंकाओं का कुहासा, संशय के बादल और अस्पृश्टता सब दूर हो जाते थे । निसंदेह वे ‘आधुनिक मनु’ थे उन्हें भारतीय संविधान के पिता अथवा मुख्य रचयिता कहा जाना चाहिए ।
माननीय धनंजय कीर- माननीय धनंजय कीर ने संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के संबंध में लिखा। वह अछूत जिसे छड़कों से धकेला गया जिसे लड़कपन में स्कूल में एक और अलग कर बैठाया गया जिसे प्राध्यापक के रूप में अपमानित किया गया जिसे युवा व्यवस्था में अछूत-महार कहकर होटल, हॉस्टलों,सभामंडपों, और मंदिरों से निकल गया जिसे अंग्रेजों का पिट्ठू कहकर बदनाम किया गया जिसे निर्दय राजनीतिज्ञ और शैतान कहकर तिरस्कार किया गया जिसे गांधी जी को गालियां देने वाला कहकर नफरत की गई और जिसको अधिशासी पार्षद कहकर निंदा की गई वहीं अब स्वतंत्र भारत का प्रथम विधि मंत्री बना और वही भारत के लोगों की इच्छा लक्ष्य और सपनों को परिभाषित करने वाले संविधान का मुख्य रूप से निर्माता बना । भारत के इतिहास की यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि भी है और हैरानी भी। भारत ने अपने युग युगांतरों से चले आ रहे अछूतपन के पाप को दूर करने के लिए अपना शास्त्रकार नया मनु अपना नया स्मृतिकार उसे जाति से चुनाव जिसे युगों से पशु के समान कर दिया गया था। जिसका मनोबल क्षीण कर दिया गया था। और जिसकी शक्ति नष्ट कर दी गई थी नवभारत ने अपना संविधान बनाने का कार्य उस व्यक्ति को सौप जिसे कुछ वर्ष पहले हिंदुओं के संविधान मनुस्मृति को अग्नि में भस्मसात किया था ।

अरुण चंद्र गुहा (पश्चिम बंगाल) ने जो एक कट्टर गांधीवादी एक कांग्रेसी सदस्य थे, फ्रैंक एंथोनी (सी.पी. एंड बरार) कृष्ण चंद्र शर्मा (यूनाइटेड प्रोविंसेज) विश्वनाथ दास (उड़ीसा) लोकनाथ मिश्र (उड़ीसा) काजी सैयद करीमुद्दीन (सी.पी. एंड बरार) प्रोफेसर केटी शाह (बिहार) पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र (पश्चिम बंगाल) रामनारायण सिंह (बिहार) डॉ पंजाब राव देशमुख (सी.पी. एंड बरार) एस नागप्पा माननीय के संथानम, आर के सिधवा, जयनारायण व्यास (जोधपुर) बी.ए मंडलोई (सी.पी. एंड बरार) पंडित बालकृष्ण शर्मा (यूनाइटेड प्रोविंसेज) पंडित ठाकुरदास भार्गव (पूर्वी पंजाब) प्रोफेसर सिब्बनलल सक्सेना (यूनाइटेड प्रोविंसेज) सारंगधर दास (उड़ीसा) आर.आर दिवाकर (मुंबई) महमूद अली बेग साहिब बहादुर (मद्रास) जेड.एस लारी, हुसैन इमाम बेगम एजाज रसूल (यूनाइटेड प्रोविंसेज) वी.आई मनुस्वामी पिल्लई (मद्रास) आयुष्मति दक्षिणापानी (मद्रास) देशबंधु गुप्ता (दिल्ली) ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर (पूर्वी पंजाब) माननीय जे.जे.एम निकोलस-राय (असम) मोहम्मद इस्माइल साहब (मद्रास) पंडित गोविंद मालवीय, एम. अंतथसनम (मद्रास) रोहिणी कुमार चौधरी (असम) एल कृष्णमाचारी भारथी (मद्रास) विशंभर दयाल त्रिपाठी (यूनाइटेड प्रोविंसेज) ए.बी कृष्णमूर्ति राव (मैसूर) इन सभी ने डॉ बाबासाहेब अंबेडकर के द्वारा किए गए कार्य की भूरि.भूरि प्रशंसा की और उन्हें और प्रारूप समिति को अनेक बधाइयां दी
