[tta_listen_btn]हमारे सामने यह एक और तकलीफदेह सवाल है कि जिसका हमें केवल जवाब नहीं ढूंढना बल्कि उससे निपटना भी है | सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि पिछले 50 वर्षों में विभिन्न किस्म के चमचे बने कैसे | आज भारत पर शासन करने वाले ऊंची जातियों के हिंदुओं ने चमचे बनाने की जरूरत को केवल तक महसूस किया जब उन्हें दलित वर्गों से सच्चे और खरे नेतृत्व से खतरा हुआ | आज जब दलित और शोषित समुदायों के पास कोई खरा और सच्चा नेतृत्व नहीं है , तो चमचे भी मुखर नहीं है और उनकी अधिक मांग भी नहीं है | जो भी हो , अब चमचों की वैसी पूछ नहीं है जैसी पहले होती थी किंतु बामसेफ और डी -एस फोर के माध्यम से सच्चे और खरे नेतृत्व का उत्थान होने से चमचे फिर से महत्वपूर्ण हो सकते हैं | यह स्थिति तब तक रहेगी जब तक उत्पीड़क और उत्पीड़ित के बीच संघर्ष रहेगा | जहां तक मेरा आकलन है तो चमचा युग का बिल्कुल से अंत करने में 10 वर्ष से अधिक नहीं लगनी चाहिए – कांशीराम
कितना पुराना है चमचा युग
24 सितंबर 1932 को पूना समझौता दलित वर्गों पर थोप दिया गया | इसके साथ ही चमचा युग शुरू हो गया | जब हिंदुओं को थोड़ी सी सत्ता देने के लिए बाध्य किया गया तो वे बचाव की मुद्रा में आ गए | वे यह सुनिश्चित करने को तत्पर हो गए कि उस पर से उनका नियंत्रण न छूटे | इसके लिए संयुक्त निर्वाचन मंडल का सहारा लिया गया | संयुक्त निर्वाचन मंडल के माध्यम से ,अछूतों के प्रतिनिधि केवल नाम के प्रतिनिधि बन गए, वास्तविक प्रतिनिधि नहीं ,क्योंकि हिंदुओं का नामित और उनके हाथों का चमचा बनने को सहमत नहीं होने वाला कोई भी अछूत एक संयुक्त निर्वाचन मंडल में नहीं चुना जा सकता था क्योंकि उसमें अछूतों और हिंदुओं का अनुपात 1 और 5 तथा कहीं-कहीं तो 1 और 10 था |
यही कारण था कि गांधी जी पृथक निर्वाचन मंडल के माध्यम से एक वास्तविक प्रतिनिधि के बजाय संयुक्त निर्वाचन मंडल के माध्यम से दो चमचे देने को सहमत हो गए | किंतु कितने भी चमचे एक वास्तविक प्रतिनिधि का भी स्थान नहीं ले सकते | दलित वर्गों ने इसे पसंद किया हो या नहीं किंतु पूना समझौते ने उन्हें 24 सितंबर 1932 को चमचा युग में धकेल दिया यह चमचा युग 24 सितंबर 1982 को 50 साल का हो जाएगा और उसी दिन ड़स डीअस फोर पुणे में ही पूना समझौते की निंदा करेगा
