जाति, एक ऐसा शब्द जिसने भारतीय समाज को तबादला किया है। हम इस शब्द से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी यह हमें सबसे अच्छी जगहों पर भी पार पहुंचा देता है।
सीन 1: सड़क पर
एक सुनहरी सुबह, सड़क की चारों ओर हलकी सी गाड़ीयों की आवाज गूंज रही थी। भास्कर, अपने बड़े-बड़े बालों के साथ, मोबाइल पर कुछ देखते हुए चल रहा था। उसकी आँखों में सिर्फ उस छोटे से स्क्रीन की चमक थी।
सीन 2: कार से टक्कर
जैसे ही वह सड़क पार कर रहा था, एक तेज़ रफ्तार की कार उससे टक्कर मार देती है। ध्वनियाँ, चिल्लाना, टक्कर की आवाज़, सब कुछ एक साथ हो जाता है।
कार का ड्राइवर, अंजुल, उसकी ओर देखता है और पूछता है, “अबे क-कहां चले आ रहे हो बे?”
भास्कर थोड़ा चकित होते हुए जवाब देता है, “सॉरी ब्रदर, मैं अपनी कास्ट चेक कर रहा था।”
अंजुल की आंखों में हैरानी की चमक आ जाती है, “जाति चेक? अबे! लोग मोबाइल में बैलेंस चेक करते हैं!”
भास्कर हंसता है और कहता है, “अरे ब्रदर इंडिया में लोग बैलेंस से ज्यादा कास्ट चेक करते हैं, कास्ट मैटर।”
सीन 3: डिस्को में डांस करते वक्त
भास्कर की आंखों में फ्लैशबैक चलता है। डिस्को की रौंगतें, लोग नाचते हुए। समीर, उसके पास आता है और पूछता है, “और भाई, कौन हो तुम?”
भास्कर प्राउ
डली कहता है, “मैं हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका से पढ़ कर आया हूं।”
समीर हंसता है और कहता है, “लेकिन कौन जात हो?”

सीन 4: निष्कर्ष
वापस सड़क पर, अंजुल हंसता है और कहता है, “वेलकम टू इंडिया!”
यह कहानी हमें यह बताती है कि चाहे हम कितने भी पढ़े-लिखे हों, जाति का सवाल हमें हर जगह हर जगह पूछा जाता है। भारत एक जाति प्रधान देश है, जिसे बदलने की जरूरत है।
