📖 डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन अपनी किताब “यदि बाबा ना होते” ( भीमराव अंबेडकर )
मैं तेरे बाल बना देती हूँ

पूरे 25 वर्ष तक सैनिक नौकरी करने के बाद 1864 में रामजी सूबेदार को ₹50 महीने की पेंशन मिली। वह परिवार को लेकर आंबावड़े गांव के पास दापोली रहने आए। वहां रहना भिमाबाई को पसंद नहीं आया तब उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के ख्याल से मुंबई जाकर रहने का निश्चय किया। परंतु मुंबई महंगी जगह थी ₹50 मासिक की पेंशन में मुंबई में क्या होने वाला था। उन्होंने मुंबई में नौकरी ढूंढने की कोशिश की मुंबई में तो नौकरी नहीं मिली परन्तु सतारा में स्टोर कीपर का काम मिल गया।1894 में रामजी सूबेदार अपने सारे परिवार को दापोली से सतारा ले गए। उनकी 14 संतानों में से उस समय केवल पांच जीवित थी । इन पांच में से एक बलराम था। जिसकी शादी हो चुकी थी और जो नौकरी करने के कारण अन्यत्र रहता था । रामजी सूबेदार की दोनों लड़कियों के भी विवाह हो चुके थे । वह अपने-अपने घरों मे रहती थी पिता के साथ रहने वाले बच्चे केवल दो जने आनंदराव तथा भीम थे ।
भीम का शरारती बचपन – Bhim’s mischievous childhood
अब भीम 6 साल का हो गया था। जैसा नाम वैसा काम अपनी उम्र के लड़कों के साथ ही नहीं, अपने से बड़ी आयु के लड़कों के साथ भी आए दिन उलझ पड़ता था । पर वह शरीर से तंदुरुस्त था और स्वभाव से शरारती अपनी आयु के बच्चों को वह पीट डालता, अपने से बड़ों को पत्थर मार कर भाग जाता।
रामजी सूबेदार और भीमाबाई से भीम की शिकायत – Bhim’s complaint to Ramji Subedar and Bhimabai
जिन लड़कों को मारता उनके माता- पिता सूबेदार रामजी तथा भीमाबाई के पास शिकायत लेकर पहुंचते सूबेदार भीम को धमका देते, किंतु हाथ उठाकर कभी भी मारते-पीटते नहीं थे । भीमाबाई कभी-कभी भीम के कान ऐंठ देती और उसे पीट भी डालति ऐसे समय मीराबाई ही थी जो भीम की रक्षा करती थी ।
भीम की माता भीमाबाई की मृत्यु – Death of Bhima’s mother Bhimabai
भीम का बड़ा भाई आनंदराव कैंप स्कूल सतारा में पढ़ता था । उसी में भीम को भी भर्ती कराया गया इस बीच रामजी सूबेदार की सतारा से गोरेगांव बदली हो गई । बेचारे अकेले ही गोरेगांव आए उधर सतारा में भीमाबाई बीमार पड़ गईओर उनकी बहुत दवा दारू की गई पर कुछ लाभ न हुआ । एक दिन सारे परिवार को रोता बिलखता छोड़ भीमाबाई इस संसार से चल गई । भीम के हृदय को मातृ वियोग से बड़ा धक्का लगा वह माता की याद में बार-बार रो रो पड़ता ।
राम जी सूबेदार की दूसरी शादी – Ram ji Subedar’s second marriage
भीमाबाई के न रहने पर घर बार की सुध लेने वाला कोई ना रहा मीराबाई पंगु होने से किसी लायक न थी मजबूर होकर राम जी सूबेदार ने जीजा बाई नाम की एक विधवा से दोबारा शादी कर ली ओर भीम ने जब देखा की सौतेली मां ने उनकी मां के जेवर पहन लिए हैं तो उसे बहुत बुरा लगा वह अपनी सौतेली मां को माँ नहीं मान सका । कभी-कभी वह उससे झगड़ पड़ता और बाद में रो भी देता।
होशियार पर शरारती भी – Smart but also naughty
इसमें संदेह नहीं की भीम होशियार लड़का था । लेकिन पढ़ाई लिखाई में उसका मन एकदम नहीं लगता था । स्कूल में जो कुछ पढ़ आया सो पढ़ आया । घर आते ही बस्ते को एक ओर पटक अपनी मंडली में पहुंच धमाचौकड़ी मचाने के लिए घर से बाहर हो जाता । झगड़ा और मारपीट तो रोज का काम था मानो यही असली पढ़ाई हो ।
आंबावड़े से आंबेडकर कैसे हुआ– How did Ambedkar come from Ambavade?
किसके मन में संदेह हो सकता है कि डॉ. अंबेडकर का जन्म तो अंबावाड़े गांव में हुआ था । तब आंबावडेकर का अंबेडकर कैसे बन गया? बात यह हुई कि बालक “भीम” को पढ़ाने वाले अंबेडकर उपनाम के एक ब्राह्मण मास्टर थे । वह भीम से स्नेह रखते थे । उनके खाने के लिए घर से रोटी साग आता तो वह उसमें से बिना भीम को कुछ दिए न खाते थे। यद्यपि छुआछूत के वह में फंसे होने के कारण वह भीम के हाथों में रोटी दूर से ही डालते थे । किंतु मन से भीम से बहुत स्नेह करते थे एक दिन उन्होंने कहा भीम यह तेरा आंबावडेकरनाम बोलने में बहुत कठिन है मेरा आंबेडकर उपनाम इससे अच्छा है । तेरा भी यही नाम रहा ।
बालक भीम अंबावडेकर से अंबेडकर बन गया | भीम के आंबेडकर बन जाने से गुरु के गांव का नाम अमर हो गया ।
भीम का जिद्दी स्वभाव– Bhima’s stubborn nature
भीम जिद्दी स्वभाव का था जिस बात की हट ठान लेता, उसे करके छोड़ता । एक बार जोर की बारिश हो रही थी उसने अपने बड़े भाईआनंद राव से कहा तुम मेरी किताबें और टोपी, छतरी में स्कूल ले जाओ मैं पानी में भीगता हुआ स्कूल आऊंगा ।भाई ने बहुत समझाया उसने एक न सुनी स्कूल पहुंचा तो उसके कपड़े पानी से तरबतर थे उस दिन उसे शाम तक अकेले लंगोटी पहने रहना पड़ा ।
नाई ने ‘अछूत’ बोलकर बाल काटने से किया इनकार – Barber refused to cut hair saying ‘untouchable’
रामजी सूबेदार सेवा में नौकरी कर रहे थे । वहां फौजी वातावरण में बालक भीम को ‘अछुतपन’ की वैसी ठेस नहीं लगी थी । अब वह बड़ा हो चला था सभी बुरी भली बातों को समझ सकने लायक । एक दिन भीम एक नाई के पास गया बोला बाल कटवाने हैं नाई बोला चल चल एक ‘अछूत’ होकर मुझसे बाल कटवाने आया है ।
मैं तेरे बाल बना देती हूँ – I will cut your hair
भीम के स्वाभिमान को ठेस पहुंची । वह आंखें पोंछता हुआ घर गया । बड़ी बहन तुलसी ने पूछा भीम रोता क्यों है भीम ने आप बीती कह सुनाई तुलसा बाई बोली इसमें रोने की क्या बात है ला मैं तेरे बाल बना देती हूं । क्यों? रोने की बात क्यों नहीं थी अवश्य थी। नाई का ‘भीम’ के बाल काटने से इनकार करना मानवता का अपमान था । भीम विवश था। क्या करता इस जहर को पी गया ।
स्कूल में बैठने के लिए अपने घर से टाट लेकर आते थे – Used to bring a sack from home to sit in school
स्कूल में प्राय: हर समय भीम को अपने ‘अछूत’ माने जाने का दंड भुगतना पड़ता था । स्कूल के सभी बच्चे बेंचों पर बैठते और डेस्कों पर कॉपियां रखकर लिखते-पढ़ते । आनंदराव तथा भीम दोनों भाइयों को जमीन पर टाट पर बैठना पड़ता । जीस टाट पर वह बैठते वह टाट भी उन्हें अपने घर से लाना पड़ता । दूसरे लड़के क्रिकेट आदि खेल खेलते तो दोनों भाइयों मे विशेष रूप से भीम उसे मन मारकर बैठे देखते रहते थे । प्यास लगती तो वह पानी के नल की टोटी तक अपने हाथ से ना घुमा सकते थे । कोई दूसरा लड़का घुमाये तभी यह सार्वजनिक नल का भी पानी पी सकते थे । एक बार तो एक सार्वजनिक प्याऊ पर पानी पीने जाने पर ‘भीम’ की अच्छी मरम्मत तक हुई थी ।
बेलगाड़ी वाले ने ले जाने से मना किया – The cart driver refused to take it
एक बार आनंदराव और भीम को एक रेलवे स्टेशन से गोरेगांव तक कैसे भी हो जाना था । शाम का वक्त था वह किसी बैलगाड़ी से जा सकते थे । किंतु कोई बैलगाड़ी वाला दो ‘अछूत’ लड़कों को अपनी गाड़ी में बैठाकर ले जाने के लिए तैयार ना हुआ । एक गाड़ी वाले ने दुगने पैसे लेकर इन्हें ले जाना स्वीकार किया, किंतु इस शर्त पर कि वह स्वयं गाड़ी पर नहीं बैठेगा । दोनों बच्चों में से किसी एक को ही गाड़ी हाकनी होगी वह स्वयं पैदल चलेगा । गाड़ी वाला गाड़ी हाँकता तो ‘अछूत’ बच्चों से ‘छू’ जा सकता था ।
‘अछूत बच्चों का स्पर्श ही बुरा था । उनसे मिलने वाले पैसे नहीं
भीम स्वभाव से स्वाभिमानी थे ऐसी छोटी-छोटी अनेक घटनाओं ने और ऐसे ही अनुभवों ने डॉ. बी.आर अंबेडकर को ब्राह्मणी व्यवस्था का घोर शत्रु बना दिया था ।
